राष्ट्रीय राजधानी में फैली बीमारी चिकुनगुनिया बड़ी संख्या में लोगों को अपनी चपेट में ले रही है और इसके कारण कई मौतों की भी खबर आ रही है। आज तक कर्नाटक में 9000 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं जबकि दिल्ली में आधिकारिक तौर पर सिर्फ 1724 मामले ही सामने आए हैं। फिर भी दिल्ली में इस वायरस जनित बीमारी के कारण बेहद घबराहट है। भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक एम सी मिश्रा ने विज्ञान लेखक पल्लव बाग्ला से बात करते हुए उत्तर भारत में चिकुनगुनिया के मामलों में इजाफे से जुड़ी कुछ धारणाओं को खारिज किया।
प्रश्न- क्या चिकुनगुनिया के कारण घबराने की जरूरत है? क्या यह घातक है? दिल्ली में लोग क्यों मर रहे हैं?
उत्तर- दिल्ली में चिकुनगुनिया के मामलों में वृद्धि हो रही है। दिल्ली में यह महामारी के रूप में नहीं है। चिकुनगुनिया के कारण घबराने की कोई जरूरत नहीं है। यह हल्का वायरस है, इसमें एक से दूसरे रूप में बदलाव नहीं होता और जिन मौतों की जानकारी मिली है, शायद वे सिर्फ चिकुनगुनिया की वजह से न हुई हों। यह अन्य बीमारियों से कहीं ज्यादा जुड़ा हुआ हो सकता है। घबराइए नहीं और यह मत सोचिए कि जिस किसी को भी चिकुनगुनिया हुआ है, वह मरने वाला है। दक्षिण भारत में कई साल से चिकुनगुनिया मौजूद है और वहां कभी घबराहट की स्थिति नहीं हुई।
उत्तर- दिल्ली में चिकुनगुनिया के मामलों में वृद्धि हो रही है। दिल्ली में यह महामारी के रूप में नहीं है। चिकुनगुनिया के कारण घबराने की कोई जरूरत नहीं है। यह हल्का वायरस है, इसमें एक से दूसरे रूप में बदलाव नहीं होता और जिन मौतों की जानकारी मिली है, शायद वे सिर्फ चिकुनगुनिया की वजह से न हुई हों। यह अन्य बीमारियों से कहीं ज्यादा जुड़ा हुआ हो सकता है। घबराइए नहीं और यह मत सोचिए कि जिस किसी को भी चिकुनगुनिया हुआ है, वह मरने वाला है। दक्षिण भारत में कई साल से चिकुनगुनिया मौजूद है और वहां कभी घबराहट की स्थिति नहीं हुई।
प्रश्न- क्या दिल्ली में फैला हुआ चिकुनगुनिया ज्यादा संक्रामक रोग है?
उत्तर- मैं कहना चाहता हूं कि चिकुनगुनिया की वजह से घबराने की जरूरत नहीं है। चिकुनगुनिया डेंगू की तुलना में कहीं कमजोर वायरस है। यह खुद को सीमित कर लेता है। चिकुनगुनिया का एकमात्र पहलू यह है कि इसके शुरू होने पर तीन से पांच दिन तक तेज बुखार रहता है और जोड़ों में दर्द रहता है। मुझे लगता है कि जोड़ों का दर्द ज्यादा परेशान करने वाला है और इससे मुश्किल ही किसी की मौत होगी। हम मौतों के लिए चिकुनगुनिया को जिम्मेदार भी नहीं ठहरा सकते क्योंकि बुजुर्ग लोगों, बेहद कम उम्र के लोगों या कम प्रतिरोधी क्षमता वाले लोगों में कई अन्य चिकित्सीय बीमारियां हो सकती हैं, जो इस वायरस से कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं।हम केरल और कर्नाटक में लोगों के चिकुनगुनिया की चपेट में आने के बारे में सुना करते थे और सोचते थे कि यह उसी क्षेत्र में होता है। अंतर सिर्फ इतना है कि इस साल हम डेंगू के बजाय चिकुनगुनिया के मामलों में इजाफा देख रहे हैं। अब तक जो परीक्षण हुए हैं और जिनके परिणामों में चिकुनगुनिया की पुष्टि हुई है, वह डेंगू से ज्यादा है। बीमारियों की पहचान के लिए किए गए परीक्षणों में 60 प्रतिशत मामले चिकुनगुनिया के पाए गए। इसके अलावा डेंगू के दो से तीन प्रतिशत ही मामले रहे। जबकि बाकी मामले गैर-डेंगू और गैर-चिकुनगुनिया के रहे। हालांकि कभी-कभी ये गैर-डेंगू और गैर-चिकुनगुनिया के मामले बेहद गंभीर हो सकते हैं। लोगों को समझना चाहिए कि यह मानसून के बाद आने वाला एक मौसम है। जब यह आता है तो इन मामलों में इजाफा होता है और जब तापमान कम होता है तो यह चला जाता है क्योंकि मच्छर तब पनप नहीं सकते।
उत्तर- मैं कहना चाहता हूं कि चिकुनगुनिया की वजह से घबराने की जरूरत नहीं है। चिकुनगुनिया डेंगू की तुलना में कहीं कमजोर वायरस है। यह खुद को सीमित कर लेता है। चिकुनगुनिया का एकमात्र पहलू यह है कि इसके शुरू होने पर तीन से पांच दिन तक तेज बुखार रहता है और जोड़ों में दर्द रहता है। मुझे लगता है कि जोड़ों का दर्द ज्यादा परेशान करने वाला है और इससे मुश्किल ही किसी की मौत होगी। हम मौतों के लिए चिकुनगुनिया को जिम्मेदार भी नहीं ठहरा सकते क्योंकि बुजुर्ग लोगों, बेहद कम उम्र के लोगों या कम प्रतिरोधी क्षमता वाले लोगों में कई अन्य चिकित्सीय बीमारियां हो सकती हैं, जो इस वायरस से कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं।हम केरल और कर्नाटक में लोगों के चिकुनगुनिया की चपेट में आने के बारे में सुना करते थे और सोचते थे कि यह उसी क्षेत्र में होता है। अंतर सिर्फ इतना है कि इस साल हम डेंगू के बजाय चिकुनगुनिया के मामलों में इजाफा देख रहे हैं। अब तक जो परीक्षण हुए हैं और जिनके परिणामों में चिकुनगुनिया की पुष्टि हुई है, वह डेंगू से ज्यादा है। बीमारियों की पहचान के लिए किए गए परीक्षणों में 60 प्रतिशत मामले चिकुनगुनिया के पाए गए। इसके अलावा डेंगू के दो से तीन प्रतिशत ही मामले रहे। जबकि बाकी मामले गैर-डेंगू और गैर-चिकुनगुनिया के रहे। हालांकि कभी-कभी ये गैर-डेंगू और गैर-चिकुनगुनिया के मामले बेहद गंभीर हो सकते हैं। लोगों को समझना चाहिए कि यह मानसून के बाद आने वाला एक मौसम है। जब यह आता है तो इन मामलों में इजाफा होता है और जब तापमान कम होता है तो यह चला जाता है क्योंकि मच्छर तब पनप नहीं सकते।
प्रश्न- एक आम आदमी को चिकुनगुनिया के संक्रमण से कैसे निपटना चाहिए?
उत्तर- मूल तौर पर तीन-एच की प्रक्रिया का पालन करें। पहला एच है होमकेयर यानी घर पर देखभाल। दूसरा हाइड्रेश यानी पर्याप्त मात्रा में तरल पदाथरें का सेवन और तीसरा एच है हाइड्रो थेरेपी। मतलब घर पर आराम करें, पोषण और तरल पदाथरें की मात्रा उचित रहे और अंत में हाइड्रो थेरेपी करें। इसका यह मतलब नहीं है कि आपने माथे या हथेलियों पर गीला रूमाल रख दिया। अच्छा होगा कि आप तेज बुखार में तप रहे व्यक्ति को गीली चादर लपेट दें। इससे बुखार कम हो जाएगा।
उत्तर- मूल तौर पर तीन-एच की प्रक्रिया का पालन करें। पहला एच है होमकेयर यानी घर पर देखभाल। दूसरा हाइड्रेश यानी पर्याप्त मात्रा में तरल पदाथरें का सेवन और तीसरा एच है हाइड्रो थेरेपी। मतलब घर पर आराम करें, पोषण और तरल पदाथरें की मात्रा उचित रहे और अंत में हाइड्रो थेरेपी करें। इसका यह मतलब नहीं है कि आपने माथे या हथेलियों पर गीला रूमाल रख दिया। अच्छा होगा कि आप तेज बुखार में तप रहे व्यक्ति को गीली चादर लपेट दें। इससे बुखार कम हो जाएगा।
यदि आप सोचते हैं कि सिर्फ पेरासिटामोल लेने से बुखार कम हो जाएगा तो ऐसा नहीं होने वाला क्योंकि पेरासिटामोल लेने पर बुखार 106 डिग्री से घटकर 104 डिग्री पर ही आएगा। बुखार को वाकई कम करने के लिए गीली चादर ओढ़ाना एकमात्र उपाय है। आपको मरीज को गीली चादर ओढ़ाकर पंखे को तेज गति से चलाना है। इससे बुखार तेजी से उतरेगा और तेज ताप के कारण पड़ने वाले बुरे प्रभाव कम किए जा सकते हैं। 106 डिग्री का तेज बुखार यदि एक लंबे समय तक बना रहे तो यह अंगों को निष्क्रिय कर सकता है। हाइड्रो थेरेपी से इससे बचा जा सकता है।
प्रश्न- चिकुनगुनिया तो कई साल से रहा है। इस साल लोग क्यों मर रहे हैं?
उत्तर- यह महज इतनी बात हो सकती है कि मरने वाले लोगों में चिकुनगुनिया भी पाया गया। इन मरीजों में इसके पीछे के कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं। वे मधुमेह से पीड़ित हो सकते हैं, जिसके कारण कोई भी बीमारी ज्यादा गंभीर हो सकती है। उनमें कई संक्रमण एकसाथ हो सकते हैं। इन मामलों के पीछे के कारण चिकुनगुनिया और अन्य किस्म के वायरस दोनों ही हो सकते हैं।
उत्तर- यह महज इतनी बात हो सकती है कि मरने वाले लोगों में चिकुनगुनिया भी पाया गया। इन मरीजों में इसके पीछे के कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं। वे मधुमेह से पीड़ित हो सकते हैं, जिसके कारण कोई भी बीमारी ज्यादा गंभीर हो सकती है। उनमें कई संक्रमण एकसाथ हो सकते हैं। इन मामलों के पीछे के कारण चिकुनगुनिया और अन्य किस्म के वायरस दोनों ही हो सकते हैं।
हमें इस बात की गहराई में जाना होगा कि क्या इसके पीछे की वजह सिर्फ चिकुनगुनिया है? इसमें कोई रूप परिवर्तन नहीं हो रहा। लोगों को घबराना नहीं चाहिए। चिकुनगुनिया बहुत से लोगों को हो रहा है और वे घर पर ठीक हो रहे हैं। हां, जोड़ों का दर्द कई सप्ताह या कई बार तो कुछ महीनों तक रह सकता है। यह आम तौर पर समय लेता है क्योंकि यदि आप इसके प्राकृतिक इतिहास पर नजर डालें तो यह काफी समय से शरीर में रहता है।
प्रश्न- तो आप किसी नए वायरस की संभावना को खारिज नहीं कर रहे हैं लेकिन यह कह रहे हैं कि चिकुनगुनिया के ज्यादा संक्रामक रूप की संभावना नहीं है?
उत्तर- हमने वायरलॉजिस्ट से बात की है और उनका मानना है कि कोई रूप परिवर्तन नहीं है और वायरस के डीएनए या आरएनए में कोई बदलाव नहीं है। उनका मानना है कि यह साधारण चिकुनगुनिया वायरस है और उन्होंने इसके रूप में कोई बदलाव नहीं देखा है।
उत्तर- हमने वायरलॉजिस्ट से बात की है और उनका मानना है कि कोई रूप परिवर्तन नहीं है और वायरस के डीएनए या आरएनए में कोई बदलाव नहीं है। उनका मानना है कि यह साधारण चिकुनगुनिया वायरस है और उन्होंने इसके रूप में कोई बदलाव नहीं देखा है।